बचपन की यादें, परिवार, समाज का दबाव, अवसाद (डिप्रेशन)
मेरा नाम है संदीप शर्मा, उम्र 38 साल। मैं एक छोटे कस्बे से हूँ और बचपन से ही परिवार की उम्मीदों के बीच बड़ा हुआ। मेरे पिताजी किसान थे। बचपन की गली-गली की दौड़, दोस्तों के साथ खेलना, माँ के हाथों का खाना, और पिताजी की मेहनत ने मुझे जिम्मेदारी का असली अर्थ सिखाया। लेकिन पिताजी की अचानक मृत्यु ने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी। कच्ची उम्र में ही पूरे घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। पढ़ाई अधूरी रह गई और घर चलाने के लिए काम करना पड़ा। धीरे-धीरे ज़िंदगी की भागदौड़ में मैं खुद को भूलने लगा। शादी के बाद जिम्मेदारियाँ और बढ़ीं। मेरी पत्नी बहुत समझदार है, लेकिन सच कहूँ तो मेरे अंदर का आत्मविश्वास धीरे-धीरे खत्म हो रहा था। ऑफिस का तनाव, पैसे की तंगी और समाज का ताना — “अभी तक तरक्की क्यों नहीं हुई?”, “हमेशा थका हुआ क्यों रहता है?” — ये बातें मुझे अंदर से तोड़ रही थीं। मेरे बच्चे भी अक्सर पूछते, “पापा, आप हमारे साथ खेलते क्यों नहीं?” यह सुनकर दिल भर आता था। मैं उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा था। धीरे-धीरे मैं डिप्रेशन में चला गया। रातों की नींद उड़ गई, हर वक्त थकान रहती और रिश्तों में भी दूरी ...